यूपी की राजनीति में मुसलमानों के वोट की कितनी है अहमियत, इन्हे पटाने की भाजपा क्या है रणनीति


उत्‍तर प्रदेश में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव के होने है और इसीके मद्देनजर बीजेपी ने मुस्लिम वोटों को भी रिझाने की कोशिश शुरू कर दी है। ऐसे समय में जब प्रदेश की सियासत में हिन्‍दुत्‍व और हिन्‍दू धर्म में अंतर पर बहस छिड़ी हो, तो बीजेपी का यह नया पैंतरा विरोधियों के लिए चिंता का सबब बन सकता है। यूपी के तीन दिवसीय दौरे पर आए पीएम मोदी ने महोबा में ट्रिपल तलाक के बहाने मुस्लिम महिलाओं को संदेश देने की कोशिश की। 
उन्‍होंने कहा कि महोबा में ही मुस्लिम बहनों को इससे मुक्ति दिलाने का वादा किया था। हमने अपना वादा पूरा कर दिया है। वैसे ये पहला मौका नहीं है जब बीजेपी यूपी में मुस्लिम मतदाताओं को लुभाने की कोशिश करती दिख रही है। यूपी चुनाव की आहट के साथ ही पार्टी ने इसकी कोशिशें शुरू कर दी थीं। इसी के तहत पार्टी अल्‍पसंख्‍यक मोर्चा के नेताओं और कार्यकर्ताओं को अपना 'दूत' बनाकर मुसलमानों के घर-घर मोदी-योगी सरकार की उपलब्धियों को पहुंचाने की कोशिश कर रही है। इसके साथ ही एलट क्‍लास, कारोबारी और सामान्‍य परिवारों के पढ़े-लिखे मुसलमानों को जोड़ने के लिए प्रबुद्ध अल्‍पसंख्‍यक सम्‍मेलनों की रणनीति पर भी काम हो रहा है। 
दरअसल, बीजेपी के रणनीतिकारों को भरोसा है कि 'सबका साथ, सबका विकास और सबका विश्‍वास' के नारे के सहारे पार्टी मुसलमानों के एक वर्ग को अपने साथ ला सकती है। ट्रिपल तलाक से वर्षों तक पीड़ित रही आधी आबादी का दृष्टिकोण भी पार्टी के प्रति सकारात्‍मक है और इसे वोटों में तब्‍दील किया जा सकता है। 
यूपी की राजनीति में मुसलमानों की अहमियत हमेशा से रही है। इस बार जब एक-एक सीट और एक-एक वोट के लिए पार्टियों के बीच संघर्ष की स्थ्‍िाति दिख रही है, यह अहमियत और भी ज्‍यादा हो गई है। एक अनुमान के मुताबिक यूपी में करीब 20 फीसदी आबादी मुसलमानों की है। प्रदेश के कम से कम 24 जिले ऐसे हैं जहां 20 से 60 फीसदी तक मुस्लिम आबादी है। कुल 143 सीटों पर मुसलमानों का प्रभाव बताया जाता है। इममें से 73 सीटों पर मुसलमान 30 फीसदी से ज्‍यादा हैं और 70 सीटों पर 20 से 30 फीसदी के बीच। माना जाता है परम्‍परागत रूप से मुस्लिम समाज वोट करते वक्‍त अपने मुद्दों को ध्‍यान में रखता है। सूबे में समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी और कांग्रेस मुस्लिम वोटों पर अपनी-अपनी दावेदारी पेश करती आई हैं। इधर, कुछ वर्षों से मैदान में आई असदुद्दीन ओवैसी की एआईएमआईएम ने भी अपना हक जताना शुरू कर दिया है। अब बीजेपी ने अपने ढंग से मुस्‍लिम वोटों में सेंध लगाने की कोशिश शुरू की है। 
लेकिन 2017 के चुनाव में कई विश्‍लेषकों का मानना था कि मुस्लिम वोटरों के वोट देने का पैटर्न बदला है। इस पर तरह-तरह के कयास भी लगने लगे थे। पिछले चुनाव में बीजेपी को बुंदेलखंड की सभी 19 सीटें मिल गई थीं। पश्चिमी उत्‍तर प्रदेश में मुस्‍लिम प्रभाव वाली कई सीटों पर पार्टी जीती थी। इससे राजनीति के जानकारों ने बीजेपी की नई संभावनाओं पर सोचना शुरू कर दिया था लेकिन इस चुनाव में पार्टी का शीर्ष नेतृत्‍व भी इस सम्‍भावनाओं को टटोलता नज़र आ रहा है तो पार्टी में हर स्‍तर पर कोशिशें शुरू हो गई हैं। ये कोशिशें यदि रंग लाती हैं तो मुस्लिम वोटों के पैटर्न में वाकई परम्‍परा से हट कर थोड़ा-बहुत भी फेरबदल होता है तो यह सूबे की बड़ी ताकतों मे से किसी के लिए जीत और किसी के लिए हार का सबब बन सकता है। 

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