यूपी विधानसभा चुनाव में दूसरे चरण के मतदान में अखिलेश की शोसल इंजिनियरिंग ने जानें कैसे किया मुकाबला कांटे का


उत्तर प्रदेश में विधान सभा के चुनाव में सोमवार को दूसरे चरण की वोटिंग की गई। इन चुनावों में अखिलेश यादव की सोशल इंजीनियरिंग ने इसे कांटे का मुकाबला बना दिया है। दूसरे चरण में उत्तर प्रदेश के 9 ज़िलों की 55 सीटों पर 61.80 प्रतिशत वोटिंग हुई। पिछली बार इन्हीं सीटों पर लगभग 65 प्रतिशत वोटिंग हुई थी. इस हिसाब से इस बार 3 प्रतिशत कम वोट डाले गए हैं।
मतदान के दूसरे चरण में जिन 9 ज़िलों में वोटिंग थी, उनमें सात ज़िले ऐसे हैं, जहां 30 प्रतिशत से ज्यादा मुस्लिम आबादी है. जबकि मुरादाबाद और रामपुर में मुस्लिम आबादी 50 प्रतिशत से ज्यादा है. कुल मिला कर कहें तो इस चरण में मुस्लिम वोटर्स बहुत महत्वपूर्ण थे. इन 9 ज़िलों की 55 में से कुल 38 सीटें ऐसी हैं, जिन पर मुसलमानों के वोट बहुत अहम हैं.
विभिन्न इलाकों में हुई वोटिंग का एक लाइन में सार ये था कि इस बार उन इलाक़ों में ज़बरदस्त वोटिंग हुई है, जहां मुस्लिम आबादी ज़्यादा है. 
समीक्षको के अनुमान के मुताबिक, इस बार इन सीटों पर मुसलमान वोटर्स ने 65 से 70 प्रतिशत तक मतदान किया है. 2017 में ये आंकड़ा 50 प्रतिशत था. यानी 50 प्रतिशत मुस्लिम समुदाय के लोगों ने वोट ही नहीं डाले थे. लेकिन इस बार 15 से 20 प्रतिशत वोटिंग ज्यादा हुई. इसका सीधा सा मतलब ये है कि मुस्लिम मतदाता जानते थे कि उन्हें किसे और क्यों वोट करना है. हालांकि यहां पर मुसलमानों के ज्यादा वोट डालने पर भी वोटिंग प्रतिशत 2017 की तुलना में कम है, जिससे ये पता चलता है कि हिन्दुओं ने इस बार कम वोटिंग की है. यानी हिन्दू वोटर्स में इस बार कम उत्साह दिखाई दिया है, जो बीजेपी के लिए अच्छी ख़बर नहीं है.
एक और बात..इन सीटों पर अधिक मुस्लिम मतदाता होते हुए भी पिछली बार बीजेपी को यहां शानदार जीत मिली थी. 2017 में बीजेपी ने यहां की 55 में से 38 सीटें, समाजवादी पार्टी ने 15 और कांग्रेस ने दो सीटें जीती थीं. जबकि बीएसपी को एक भी सीट नहीं मिली थी. ऐसा इसलिए हुआ था, क्योंकि अखिलेश यादव तब केवल मुस्लिम प्लस यादव वोटों की सोशल इंजीनियरिंग पर निर्भर थे.
इस बार उन्होंने अपना फॉर्मुला बदल दिया है. अब उन्होंने एक नया फॉर्मुला बनाया है और वो है, M प्लस Y प्लस J + S/M + K + G.. यानी मुस्लिम.. प्लस.. यादव.. प्लस.. जाट.. प्लस.. सैनी/मौर्य.. प्लस.. कुर्मी.. प्लस.. गुर्जर..हलांकि योगी आदित्यनाथ और बीजेपी तो 80-20 के फॉर्मुले पर चुनाव लड़ रहे हैं. जिसमें वो 20 प्रतिशत मुस्लिम वोटर्स को छोड़ कर, 80 प्रतिशत हिन्दू वोटर्स को एकजुट रखने पर ज़ोर दे रहे हैं. आप ये भी कह सकते हैं कि बीजेपी केवल 80 नम्बर का पेपर कर रही थी और 20 नम्बर के सवाल को उसने खाली छोड़ दिया है. जबकि अखिलेश यादव 20 प्रतिशत मुस्लिम वोट तो उनकी पार्टी को मिलेंगे ही इसलिए उन्होंने हिन्दू वोटों को अलग अलग भागों में बांट कर एक नई सोशल इंजीनियरिंग की है.
2017 में अखिलेश यादव की पार्टी इस क्षेत्र में इसलिए हार गई थी क्योंकि उसने मुस्लिम और यादव वोटों को एकजुट रखने के लिए मुस्लिम  उम्मीदवारों को ज़्यादा टिकट दिए थे. इस बार उन्होंने ऐसा नहीं किया. इस बार उन्होंने ऐसी सीटों पर मुस्लिम उम्मीदवार ही नहीं उतारे, जहां मुस्लिम मतदाता जीत और हार का फैसला करते हैं.
जिन 55 सीटों पर वोटिंग हुई है, उनमें 52 सीटों पर अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी के और तीन सीटों पर जयंत चौधरी की राष्ट्रीय लोकदल के उम्मीदवार थे. अखिलेश यादव ने ये जानते हुए 52 में से केवल 20 मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट दिए कि यहां 38 सीटों पर मुस्लिम फैक्टर काम करता है।

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