आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं के योगदान से जानें कैसे बची अति कुपोषित बच्चों की जान ,18 माह में 180 बच्चे हुए स्वास्थ्य


जौनपुर । सिरकोनी ब्लॉक के नेवादा गांव के शिवपूजन की बेटियां खुशी (05 वर्ष) तथा आयुषी (07 माह) बहुत कमजोर थीं। उन्हें खाना नहीं पचता था। बार-बार बीमार पड़ती थीं। वहीं नेवादा के ही लोकनाथ की बेटी कीर्तिका (02 वर्ष) को पेट में दिक्कत रहती थी। बार-बार दस्त होती थी और खाना नहीं पचता था।  खुशी और आयुषी की देख-रेख कर रहीं आंगनबाड़ी कार्यकर्ता गीता यादव तथा कीर्तिका की देखरेख कर रही आंगनबाड़ी कार्यकर्ता गायत्री ने उनका वजन कर चार्ट से मिलाया तो उनके अति गंभीर कुपोषित (सैम) होने का पता चला। दोनों आंगनबाड़ी कार्यकर्तिओं ने उनके बच्चों के  खराब हो रहे स्वास्थ्य का हवाला देकर उन्हें पोषण पुनर्वास केंद्र (एनआरसी) में भर्ती कराने पर जोर दिया लेकिन दोनों ही परिवारों ने भर्ती कराने से इनकार कर दिया।  आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं के काफी समझाने पर तीनों बच्चों के परिजन उन्हें एनआरसी में भर्ती करने को तैयार हुए। आंगनबाड़ी कार्यकर्तिओं के इस योगदान से दोनों अति गंभीर कुपोषित बच्चों की जान बच गई । 18 माह में एनआरसी  180 कुपोषित बच्चों को स्वस्थ बना चुका है ।

खुशी और आयुषी की मां ने बताया कि वह काम पर व्यस्त रहतीं हैं। घर की स्थिति ठीक नहीं है। बच्चों के पिता भी काम के सिलसिले में बाहर रहते हैं। उसकी बकरी और बच्चों को कौन देखेगा? इसलिए वह भर्ती नहीं कराना चाहती जबकि कीर्तिका की मां ने साफ-साफ इनकार कर दिया। तब आंगनबाड़ी कार्यकर्ता गीता यादव उनको  समझातीं रहीं कि एनआरसी में मुफ्त इलाज होता है, मुफ्त में खाना भी मिलेगा। इसके लिए बार-बार उनके घर जाती और समझातीं रहीं। अंततः वह एनआरसी में भर्ती कराने के लिए तैयार हो गईं। वहीं आंगनबाड़ी कार्यकर्ता गायत्री ने भी समझाया कि जब उसकी मां कीर्तिका को एनआरसी में भर्ती करा देगी तो वह उसकी सारी जिम्मेदारी उठा लेंंगी। वह अस्पताल में फोनकर बार-बार उसका हालचाल लेंंगी। बच्ची खा रही है या नहीं, दवा मिली या नहीं, जो भी दिक्कत आएगी वह उसका सहयोग करेगी। इतनी कोशिशों के बाद उनकी मां एनआरसी में भर्ती कराने को तैयार हुईं। खुशी और आयुषी 10 दिन एनआरसी में भर्ती रहीं और उसके बाद वापस आईं। उसके बाद भी बच्चों की देखरेख के लिए गीता उनके घर जाती रहीं। अब दोनों बच्चियां स्वस्थ हैं जबकि कीर्तिका 15 दिन एनआरसी में भर्ती रही। जहां उनका इलाज चला अब वह भी स्वस्थ है।
एहतियात के साथ ही उपचार भी- एनआरसी की स्टाफ नर्स मीना बताती हैं कि 23 जून 2020 को खुलने के बाद से लेकर 19 नवम्बर 2021 तक एनआरसी 180 बच्चों को कुपोषण से मुक्त कराकर उनके मां-बाप के जीवन में खुशहाली दे चुका है। 23 जून को जब एनआरसी खुला तो उस समय भी बड़ी संख्या में कोरोना के मामले सामने आ रहे थे। बावजूद इसके एनआरसी का स्टाफ यहां आने वाले बच्चों को पुष्ट करने में लगा हुआ था। वहीं स्टाफ नर्स ज्ञानती यादव बतातीं हैं कि हम लोग बच्चों की देखभाल के समय पूरा एहतियात बरतते थे। ग्लब्ज, मास्क, कैप, एप्रेन पहनकर काम करते थे। पूरे वार्ड को सेनेटाइज किया जाता था। जो भी साथ में आने वाले होते थे, उन्हें तथा स्वयं भी बार-बार साबुन से हाथ धोते थे और धुलवाते थे।


एनआरसी प्रभारी डॉ राम नगीना कहते हैं कि यहां पर कुपोषित बच्चों के इलाज के लिए चार श्रेणियां बनी हुई हैं जिन्हें हम स्टैंडर्ड डेविएशन (एसडी) कहते हैं जो कि बच्चे की उम्र और बाजुओं की गोलाई नापकर तय किया जाता है। 01 एसडी और 02 एसडी श्रेणी के बच्चों का इलाज स्थानीय प्राथमिक/सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पर ही हो जाता है। 03 एसडी श्रेणी के बच्चे एनआरसी आते हैं जबकि चौथी श्रेणी में न्यूरो और कार्डियक पीड़ित बच्चे आते हैं। उनका इलाज मेडिकल कालेज में होता है।  उन्होंने बताया कि एनआरसी आने बच्चे की पहले दिन भूख की जांच की जाती है। बच्चे और उसकी मां को समय-समय पर खाना दिया जाता है। बच्चे की कुपोषण की स्थिति के अनुसार डाइट चार्ट तैयार कर उसे पोषक भोजन दिया जाता है। साथ आने वाली मां/अभिभावक को 50 रुपए प्रतिदिन के हिसाब से अलग से खाने के लिए मिलता है। बच्चे की जांच और दवा सब मुफ्त रहती है। जो दवा अस्पताल में रहती है, दे दी जाती है। नहीं रहती है तो खरीद कर दी जाती है। अस्पताल आने-जाने में भी मरीज का कुछ खर्च नहीं होता है। राष्ट्रीय बाल स्ववस्थ्य कार्यक्रम (आरबीएसके) के लोग, आशा, आंगनबाड़ी कार्यकर्ता, एएनएम उसे लेकर आते हैं और ले जाते हैं। पीड़ित परिवार का पैसा खर्च नहीं होता है।


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