आखिर 45 वर्षो बाद जर्जर होकर गिरने पर पुल के मरम्मत की याद के लिए जिम्मेदार होगा कौन ?


जौनपुर। जनपद मुख्यालय कें दोंनो भागो को जोड़ने वाले प्रमुख ब्रिज (पुल) के मरम्मत का कार्य विभाग 45 वर्ष 10 माह बाद तब शुरू किया जब गुजरात स्थित मोरबी में पुल पर भीषण हादसा हुआ और शास्त्री पुल भी जर्जर होकर गिरने लगा और बड़ी दुर्घटना को दावत देने लगा। पुल के मरम्मत में लग रहे मटेरियल और क्वालटी सवालो के घेरे में जानकार खड़ा कर रहे है कि मरम्मत भी अधिक टिकाऊ नहीं रह सकेंगी। 
यहां बता दें कि जनपद सहित इलाहाबाद गोरखपुर जनपदो तक सरलता पूर्वक कम समय में पहुंचने को दृष्टिगत रखते हुए उत्तर प्रदेश सरकार के तत्कालीन मुख्यमंत्री स्व. नरायन दत्त तिवारी ने 24 दिसम्बर 1971 को इस शास्त्री पुल की आधार शिला रखा और 04 जनवरी 1977 को स्व .एनडी तिवारी और कांग्रेस के युवा नेता रहे स्व.संजय गांधी द्वारा उद्घाटन करते हुए पुल जनता के लिए खोल दिया गया और आव गमन शुरू हो गया।इस पुल को बन कर चालू होने के बाद इलाहाबाद से गोरखपुर की दूरी कम हो गयी और बड़ी संख्या में दिन रात वाहन चलने लगे। 
खबर है कि वर्ष 2019 में इस पुल को जर्जर होने की खबर शासन और विभाग के पास भेजी गई थी लेकिन विभाग के जिम्मेदार अधिकारी इसके मरम्मत के प्रति गम्भीर नहीं हुए और इसके गिरने अथवा भीषण हादसे का इंतजार ही कर रहे थे कि अक्टूबर 2022 में गुजरात के मोरबी में टूटने से भीषण हादसा होने के बाद पूरे देश के पुलो की चिन्ता वर्तमान सरकारो ने किया। इस घटना के बाद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने यूपी के पुलो की जांच कराने का आदेश दिया। सेतु निगम के सहायक अभियंता सोवर सिंह के साथ आई इंजीनियरों की टीम एमबीआईयू (मोबाइल ब्रिज इंस्पेक्शन यूनिट) लेकर पुल पर पहुंची। गाड़ी में लगी लिफ्ट के सहारे इंजीनियरों की टीम ने पुलि के निचले हिस्से में ड्रिल करके कंकरीट और मिट्टी के नमूने कई स्थानों से लिए।जांच में जौनपुर के शास्त्री पुल सहित प्रदेश के 25 पुल जर्जर स्थित में मिले शासन तब भी शास्त्री ब्रिज के मरम्मत को लेकर गम्भीर नहीं था। तभी अक्टूबर माह 22 के अन्तिम सप्ताह में शास्त्री पुल की दीवार भरभरा कर नदी में गिर पड़ी और पुल बड़ी दुर्घटना को दावत देने लगा। मीडिया भी पुल की मरम्मत को लेकर शोर मचाने लगा। इसके बाद जिला प्रशासन और विभाग नींद से जागा तथा मरम्मत का कार्य शुरू कर दिया है।
पुल का पैदल मार्ग से लेकर दोंनो तरफ बनी दीवारें, रेलिंग आदि बुरी तरह से जर्जर हो चुकी है। लेकिन विभाग के लोग पुल के पावे और उपर बने यात्री पथ के बीच बने रिक्त स्थानो पर सीमेंट बालू और गिट्टी का मिश्रण भरकर उसे भरने का काम किया जा रहा है। इसमें प्रयोग हो रहे मटेरियल और सभी सामनों के मिश्रण तथा गुणवत्ता को लेकर अभी से सवाल उठने लगे है। एक जानकारा प्राइवेट इंजीनियर ने बताया कि जब इस पुल की कट चुकी बेयरिंग नहीं बदला जायेगी तब तक अब यह पुल पूरी तरह से सुरक्षित नहीं हो सकेगा। इसकी स्प्रिंग भी जर्जर और पुरानी होकर कमजोर हो गयी है उसे भी बदलने के बाद ही बीच के होल आदि को सीमेंट बालू गिट्टी आदि से भरना चाहिए तभी पुल मजबूत हो सकेगा। लेकिन ऐसा न किया जाना स्पष्ट संकेत कर रहा है कि विभाग क्या गुल खिला रहा है।
पीडब्लूडी के अधिशासी अभियंता जैनू राम के  अनुसार शास्त्री पुल को कमज़ोर एवं जर्जर होने की दशा में भीषण खतरो को रोकने के लिए भारी लोडेड वाहनो को पुल से गुजरने पर प्रतिबंधित करते हुए रूटो का डायवर्जन किया गया है। इसके बाद भी बड़ी तादाद में मालवाहक ट्रक और यात्री वहन बस आदि इस पुल से पास हो रहे है। यदि कहें कि विभाग अपनी जिम्मेदारी से बचने के लिए कागजी बाजगरी का खेल किया है तो अतिशयोक्ति नहीं होगी।क्योंकि बड़े वाहनो को रोकने के लिए कोई व्यवस्था नहीं की गयी है।केवल कागज पर रूट डायवर्जन किया गया है।
यहां एक सवाल और खड़ा होता है कि 45 वर्ष बाद जब पुल बुरी तरह से जर्जर होकर गिरने तब पीडब्लूडी विभाग को इसके मरम्मत की याद आई इसके पहले क्यों नहीं करायी गयी मरम्मत यदि निर्धारित मानक समय पर पुल की मरम्मत हो गई होती तो सायद पुल जर्जर होने से बच सकता था। जनमत है कि इस लापरवाही के लिए पीडब्लूडी विभाग सहित जिले के आला हुक्मरान भी जिम्मेदार है जो इस पुल के प्रति उदासीन रहे है। अब देखना है इस मरम्मत से शास्त्री पुल कितना और कब तक मजबूत बनाकर खड़ा रह सकता है।

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