आइए जानते है 03 घन्टे 80 मीटर लम्बा रेलवे का फ्लाई ओवर कैसे बना



मिर्जापुर जिले के चुनार-चोपन खंड में चुनार और विश्वनाथपुरी स्टेशन के बीच सोमवार को तीन घंटे में 80 मीटर लंबे फ्लाईओवर का निर्माण किया गया। इससे चुनार-चोपन रेल लाइन और डीएफसी रेल मार्ग की सर्फेस क्रॉसिंग से बचाव हो सकेगा और दोनों मार्गों पर निर्बाध रेल परिचालन सुनिश्चित होगा।
डेडिकेटेड फ्रेट कॉर्रिडोर के भाऊपुर से पंडित दीनदयाल उपाध्याय स्टेशन तक के प्रोजेक्ट के चीफ जनरल मैनेजर ओमप्रकाश ने बताया कि यह ब्रिज 80 मीटर लंबा और 520 टन का है। ब्रिज मात्र तीन घंटे में तैयार किया गया है।
मालगाड़ियों की रफ्तार में मिलेगी गति
इस ब्रिज से होकर प्रयागराज की ओर से पंडित दीनदयाल उपाध्याय एवं चोपन होते हुए झारखंड को जाने वाली मालगाड़ियों को गति मिलेगी। जिन मालगाड़ियों को प्रयागराज के रास्ते पंडित दीनदयाल उपाध्याय स्टेशन की ओर से बिहार जाना होगा, वे ब्रिज के ऊपर से जाएंगी। जिन मालगाड़ियों को चोपन होते हुए झारखंड जाना होगा, ब्रिज के नीचे से जाएंगी।
इस अवसर पर जीएमआर के मुख्य कार्यकारी अधिकारी संजीव कुमार, परियोजना निदेशक राजसिंह टाक, परियोजना प्रबंधक देवेंद्र कुमार शर्मा, मुख्य परियोजना प्रबंधक पूर्णानंद झा, एआईए एल के मुख्य कार्यकारी अधिकारी दलजीत सिंह मौजूद रहे। गौरतलब है कि डेडिकेटेड फ्रेट कॉर्रिडोर देश के परिवहन क्षेत्र में सुधार करेगा और भारतीय रेलवे की क्षमता में बढ़ोतरी करेगा।
इस मार्ग पर मालगाड़ियों का निर्बाध परिवहन हो सकेगा। डेडिकेटेड रेल मार्ग के निर्माण के बाद बहुत सी माल गाड़ियां इस पर स्थानांतरित कर दी जाएंगी। इससे खाली हुए मार्गों पर यात्री ट्रेनों का संचालन सुगमता से होगा। डेडिकेटेड फ्रेट कॉर्रिडोर रेल लाइन को भारतीय रेलवे की लाइनों की तुलना में अधिक भार उठाने के लिए डिजाइन किया गया है।
विश्व स्तरीय तकनीक से हो रहा निर्माण
डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर उच्च गति और उच्च क्षमता वाले विश्वस्तरीय तकनीक के अनुसार बनाया जाने वाला रेलमार्ग है। इसे विशेष तौर पर माल एवं वस्तुओं के परिवहन हेतु बनाया जा रहा है। इस्टर्न डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर पंजाब के लुधियाना से होकर पश्चिम बंगाल के दानकुनि तक बन रहा है। वहीं, ईस्टर्न डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर के मार्ग में कोयला खदानें, थर्मल पॉवर प्लांट और औद्योगिक शहर मौजूद हैं। इसके मार्ग में पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, बिहार शामिल हैं। इस परियोजना का अधिकांश हिस्सा विश्व बैंक द्वारा वित्तपोषित हैं।

 

 

 

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