आइए जानते है किसके लिए कितना फलदायी है सूर्य उपासना का पर्व छठ पूजा


सूर्य उपासना का महापर्व भले ही 30 और 31 अक्टूबर को हो, लेकिन नहाय खाय से इसकी शुरुआत आज 28 अक्टूबर से ही हो रही है। 29 को खरना के साथ 36 घंटे का निर्जला व्रत शुरू होगा। सभी घाटों पर इसकी तैयारियां पूरी हो चुकी हैं। सुरक्षा के पूरे बंदोबस्त किए गए हैं।
ज्योतिषाचार्य पं. राकेश पांडेय ने बताया कि कार्तिक शुक्ल षष्ठी को यह व्रत मनाया जाता है। इस दिन सूर्य देव की पूजा का विशेष महत्व है। इस व्रत को करने वाली स्त्रियां धन-धान्य-पति-पुत्र व सुख-समृद्धि से परिपूर्ण व संतुष्ट रहती हैं। नहाय खाय के साथ ही छठ पूजा की शुरुआत होती है।
इस दिन स्नान के बाद घर की साफ-सफाई करने के पश्चात सात्विक भोजन किया जाता है। 29 अक्टूबर को खरना होगा। इस दिन से व्रत शुरू होता है और रात में गुड़ की बनी खीर खाकर फिर 36 घंटे का कठिन निर्जला व्रत रखा जाता है। खरना के दिन सूर्य षष्ठी पूजा के लिए प्रसाद बनाया जाता है।
30 अक्टूबर यानी रविवार को षष्ठी व्रत रहते हुए शाम को अस्त होते हुए सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है। 31 अक्टूबर को उदीयमान सूर्य को अर्घ्य दिया जाएगा। इस व्रत को करने से समस्त कष्ट दूर होकर घर में सुख शांति व समृद्धि की प्राप्ति होती है। सूर्य षष्ठी व्रत करने से विशेषकर चर्म रोग व नेत्र रोग से मुक्ति मिल सकती है।


इस व्रत को निष्ठा पूर्वक करने से पूजा व अर्घ्य दान देते समय सूर्य की किरणों को अवश्य देखना चाहिए। वैसे तो इसे लेकर कई कथाएं हैं, उसी में से एक कथा यह भी है। 'प्राचीन समय में बिंदुसर तीर्थ में महिपाल नामक एक वणिक रहता था। वह धर्म-कर्म तथा देवताओं का विरोध करता था।

एक दिन सूर्य नारायण के प्रतिमा के सामने नग्न होकर मल-मूत्र का त्याग किया, जिसके फल स्वरूप उसकी दोनों आखें नष्ट हो गई। एक दिन यह वणिक जीवन से ऊब कर गंगा नदी में कूद कर प्राण देने का निश्चय कर चल पड़ा। रास्ते में उसे ऋषि राज नारद मिले और पूछे- कहिए सेठ जी कहां जल्दी जल्दी भागे जा रहे हो?


अंधा सेठ रो पड़ा और सांसारिक सुख-दुख की प्रताड़ना से प्रताड़ित हो प्राण त्याग करने जा रहा हूं। मुनि नारद बोले- हे अज्ञानी तू प्राण त्याग कर मत मर। भगवान सूर्य के क्रोध से तुम्हें यह दुख भुगतना पड़ रहा है! तू कार्तिक मास शुक्ल पक्ष की सूर्य षष्ठी का व्रत रख। तेरा कष्ट समाप्त हो जाएग।
वणिक ने समय आने पर यह व्रत निष्ठा पूर्वक किया जिसके फल स्वरूप उसके समस्त कष्ट मिट गए व सुख-समृद्धि प्राप्त करके पूर्ण दिव्य ज्योति वाला हो गया।' अतः इस व्रत व पूजन को करने से अभीष्ट की प्राप्ति होती है।

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