जौनपुर में चाइनीज मांझे के आतंक पर सत्र न्यायालय ने खोली पुलिस जांच की राह-विकाश तिवारी
शिक्षक संदीप तिवारी की मौत रोक सकती थी पुलिस- विकास तिवारी*
*मांझे से मौत की घटनाओं पर लगाम लगाने की दिशा में कदम- अधिवक्ता विकास तिवारी की याचिका स्वीकार*
*प्रतिबंधित चाइनीज मांझे से घायल अधिवक्ता की न्यायिक लड़ाई में बड़ी सफलता – सत्र न्यायालय ने पुनरीक्षण याचिका स्वीकार कर नोटिस जारी किया*
जौनपुर, 07 जनवरी 2026
जौनपुर के अधिवक्ता आशीष शुक्ला को प्रतिबंधित चाइनीज मांझे से हुए जानलेवा हमले के मामले में न्याय की दिशा में महत्वपूर्ण सफलता मिली है। जिला एवं सत्र न्यायाधीश, जौनपुर ने दिनांक 05 जनवरी 2026 को उनकी आपराधिक पुनरीक्षण याचिका को स्वीकार करते हुए प्रवेश दे दिया तथा मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के उस आदेश के खिलाफ नोटिस जारी किया, जिसमें गंभीर अपराध की शिकायत को साधारण परिवाद मानकर पुलिस जांच से इनकार कर दिया गया था। अब इस मामले की अगली सुनवाई 12 फरवरी 2026 को होगी। इस पूरे मामले में अधिवक्ता विकास तिवारी याचिकाकर्ता का पक्ष रख रहे हैं।
घटना 13 जनवरी 2025 की है। अधिवक्ता आशीष शुक्ला अपने साथी अधिवक्ता शिवराज यादव उर्फ भैयालाल के साथ मोटरसाइकिल पर सवार होकर न्यायालय से अपने घर जा रहे थे। शास्त्री पुल के निकट पतंग उड़ा रहे अज्ञात व्यक्तियों द्वारा इस्तेमाल किए जा रहे प्रतिबंधित चाइनीज मांझे में दोनों फंस गए। मांझे से शिवराज यादव के चेहरे और गर्दन पर गंभीर चोटे आई, जबकि आशीष शुक्ला को भी चोटें पहुंची। अधिवक्ता द्वय को पतंग उड़ानें वाले प्रतिबंधित धागे में फंसा हुआ देख पतंग उड़ा रहे लोग तालियां बजाते और हंसते हुए घटना का मजा लेते रहे। दोनों अधिवक्ताओं का यश हॉस्पिटल में इलाज कराना पड़ा।
पीड़ितों ने थाना लाइनबाजार में शिकायत दर्ज कराई, लेकिन पुलिस ने प्राथमिकी दर्ज नहीं की। पुलिस अधीक्षक को आवेदन देने के बावजूद कोई कार्रवाई नहीं हुई। मजबूर होकर आशीष शुक्ला ने मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष अपने अधिवक्ता विकास तिवारी के माध्यम से आवेदन दाखिल किया, जिसमें प्राथमिकी दर्ज कर जांच की मांग की गई। लेकिन मजिस्ट्रेट ने इसे परिवाद मान लिया। इसके खिलाफ दाखिल पुनरीक्षण याचिका को अब सत्र न्यायालय ने स्वीकार कर लिया है।
यह घटना राष्ट्रीय हरित अधिकरण के आदेश की खुली अवहेलना को उजागर करती है। अधिकरण ने वर्ष 2017 में खालिद अशरफ बनाम भारत संघ मामले में स्पष्ट निर्देश दिया था कि पतंग उड़ाने के लिए नायलॉन या किसी अन्य सिंथेटिक सामग्री से बने मांझे, प्लास्टिक के धागे, तात धागा व सीसा लेपित धागा पर पूर्ण प्रतिबंध रहेगा, क्योंकि यह पक्षियों, जानवरों और मनुष्यों के लिए जानलेवा है तथा पर्यावरण को नुकसान पहुंचाता है।
सबसे दुखद बात यह है कि जिस स्थान पर आशीष शुक्ला के साथ प्रतिबंधित धागे में फंसकर घायल होने की घटना घटी थी और जिसकी शिकायत संबंधित थाना पुलिस तथा पुलिस अधीक्षक से भी की गई थी, लेकिन किसी तरह की कोई कार्रवाई नहीं हुई। लगभग एक वर्ष बाद उसी जगह घटना की पुनरावृत्ति हुई तथा अपनी बेटी को स्कूल छोड़कर घर वापस लौट रहे शिक्षक संदीप तिवारी की पतंग उड़ाने वाले प्रतिबंधित धागे में गला फंसने के कारण दुखद निधन हो गया। यदि आशीष शुक्ला की शिकायत पर पुलिस ने समय रहते कार्रवाई की होती, तो शायद संदीप तिवारी की जान बचाई जा सकती थी। पुलिस की निष्क्रियता ने न केवल पीड़ितों को न्याय से वंचित किया, बल्कि आगे की घटनाओं को भी बढ़ावा दिया।
पीड़ित आशीष शुक्ला के अधिवक्ता विकास तिवारी ने कहा कि यह लड़ाई किसी एक की नहीं है, बल्कि हर साल चाइनीज मांझे से घायल होने या मरने वाले सैकड़ों निर्दोष लोगों की आवाज है। न्यायालय का यह फैसला पुलिस को जवाबदेह बनाएगा और प्रतिबंध को सख्ती से लागू करवाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित होगा। मैं सभी नागरिकों से अपील करता हूं कि पतंग उड़ानें में केवल सुरक्षित कपास के धागे का ही उपयोग करें।
मकर संक्रांति के मौसम में ऐसे हादसे बढ़ जाते हैं। जनता से अनुरोध है कि प्रतिबंधित मांझे की बिक्री या उपयोग की सूचना तुरंत पुलिस को दें।
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