वे सियासत और इल्म के दोआब थे - डा.संजय श्रीवास्तव



हमारे समय की राजनीति विचार की दुनियां से कोसों दूर जा चुके है। जनसापेक्ष मूल्यों के साथ ईमानदारी बरतने वाले भी न रहे। इस जमात की आखिरी शख्सियत के तौर पर डा.बाबूराम निषाद को देखा जा सकता है। लंबी बीमारी के बाद कल बनारस में उनका निधन हो गया।
वे समाजवादी आंदोलन के प्रखर अनुयायी थे। पूरब के गांधी राम करन दादा के शिष्य और चौधरी चरण सिंह व मुलायम सिंह यादव के राजनीतिक सहचर रहे डा.बाबूराम निषाद। वे सत्ता के शीर्ष पद पर रह चुके थे लेकिन अभिमान उन्हें छू तक नहीं पाया था। भारत सरकार के पिछड़ा वर्ग वित्त विकास निगम के चेयरमैन‌ और बाद में उतर प्रदेश में मत्स्य आयोग के चेयरमैन भी वे रहे। जौनपुर के बयालसी विधानसभा सीट से उन्होंने समाजवादी पार्टी के टिकट पर चुनाव भी लड़ा था। लेकिन मौजूदा राजनीति का प्रपंच वे नहीं जानते थे।
छल छद्म और धनबल ने उन्हें इस चुनाव में पराजित कर दिया था। इसलिए संसदीय राजनीति से उन्होंने दूरी बना रखी थी।
वे विलक्षण प्रतिभा के धनी थे। एम.ए.हिंदी में वे बीएचयू के गोल्ड मेडलिस्ट थे। कर्रा कालेज के नाम से मशहूर गणेशराय स्नातकोत्तर महाविद्यालय,डोभी , जौनपुर से उन्होंने बीए की परीक्षा हिंदी, अंग्रेजी व संस्कृत तीनों साहित्य से एक साथ प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की थी।  पीएचडी भी बीएचयू से ही उन्होंने किया था। उनकी प्रतिभा से प्रभावित हो कर ही कर्रा कालेज के तत्कालीन प्राचार्य डा.विजय प्रताप सिंह और बीएड के तत्कालीन विभागाध्यक्ष डा. बीएल यादव ने कालेज मैनेजमेंट को राजी करके उन्हें अपने यहां शिक्षक नियुक्त कर लिया था। फिर आजीवन वे यहीं रहे और सेवानिवृत्ति ली। मूलतः गहन अध्यवसायी प्रकृति के बाबूरामजी उच्च कोटि के विद्वान और कुशल वक्ता थे।
व्यस्त राजनीतिक जीवन के बावजूद अपने शिक्षक पेशे के साथ उन्होंने हमेशा न्याय किया। वे लोकप्रिय शिक्षक के रूप में ख्यात रहे।अतिशय संवेदनशील होने के साथ ही वे विनम्रता की प्रतिमूर्ति थे। यही कारण था कि वे लोगों के दिल में अपना स्थायी भाव रखते थे।
पारिवारिक पृष्ठभूमि में भी वे उतने ही घनीभूत थे। कांग्रेस जब शवाब पर थी और उसकी तूती डालती थी तब उस जमाने में प्रदेश कांग्रेस की मशहूर अध्यक्ष कमला साहनी हुआ करती थीं, उनके दामाद थे डा.बाबूराम निषाद। कमलाजी शोहरतगढ़ (सिद्धार्थनगर) रियासत की स्वामिनी थीं। इसलिए जब वे गुज़र गयीं तो इस रियासत के स्वामी हुए डा.बाबूराम। यानि ऐश्वर्य-वैभव में भी वे किसी से कहीं से कम नहीं थे। मगर समाजवादी विचारों के बाबूराम जी ने उस सम्पत्ति को त्यागपूर्वक ग्रहण किया।  क्या मजाल जो उनके व्यक्तित्व से इसकी झलक भी किसी को मिल जाय। उन्होंने महाभारत के व्यास वचन को आत्मसात कर रखा था: 'परद्रव्येषु लोष्ठवत्' यानि पराया धन ढेले के समान समझना चाहिए। ऐसा ही उन्होंने किया। ससुराल से मिली सम्पत्ति को उन्होंने पराया धन ही माना और उस पर राज करने के बजाय अपने पुरूषार्थ से अर्जित धन को ही अपना उपादेय माना और उसी से अपने परिवार का भरण-पोषण किया। उनके इस सदविचार का ही असर परिवार पर पड़ता दिखाई।इसी का परिणाम शायद रहा कि उनकी एक बेटी आईपीएस और दूसरी बेटी कलकत्ता विश्वविद्यालय में असिस्टेंट अर्थशास्त्र की प्रोफेसर है। 
हिंदी के प्रसिद्ध आलोचक प्रो.बच्चन सिंह के वे विशेष सान्निध्य में रहे। मेरी बहुत सी मुलाकात अक्सर बनारस स्थित 'निराला निवेश' में बच्चन जी के यहां हुई। बहुत बाद में जान सका कि वे सिर्फ कर्रा कालेज के शिक्षक ही नहीं बल्कि राजनीति में हाईप्रोफाइल वाले आदमी हैं। आश्चर्य तो तब हुआ, जब ये जाना कि वे समाजवादी पार्टी में मुलायम सिंह के यहां टिकट वितरण समिति के प्रमुख लोगों में हैं। मगर साहब उन्हें किसी राजनीतिक भीड़ में कभी नहीं देखा। वे अंदश्र ही अंदर अपना काम करते रहने के आदी थे। उनके अंदर सरलता इतनी ज्यादा थी कि वे इतने ऊंचे रसूख के बाद भी जौनपुर में जब केंद्रीय मूल्यांकन होता था तो वे हम सभी के साथ कापियां जांच रहे होते थे और उस भीषण गर्मी व उमस में रूमाल हांकते हुए लगातार हफ्ता भर या दस दिन तक कापी जांचते रहते। तो, यह था उनका अपने पेशे के साथ किया जाने‌ वाला न्याय जिसके लिए वे सदैव समर्पित रहे। आज ऐसे मनीषी कर्मयोगी का अवसान हमारे समय,समाज और संस्कृति के लिए बड़ी क्षति है। उच्च शिक्षा का जिस तरह पतन हुआ है और जिस तरह की गिरावट विश्वविद्यालय और कालेजों के स्तर पर देखी जा रही है, वहां ऐसे अध्यवसायी शिक्षकों का लोप है। डा.बाबूरामजी उच्च शिक्षा और राजनीति के दोआब में सिरजे हुए विरल मेधा थे।

टिप्पणियाँ

  1. डॉ. बाबूराम निषाद जी के बारे में जो कुछ भी लिखा गया है कम है बाबू राम जी जब दिल्ली में पिछडा वर्ग वित्त निगम के अध्यक्ष थे तब मेरे घर का कई बार आना जाना हुआ था वह निहायत सरल व्यक्ति के व्यक्तित्व थे भौतिक और वैज्ञानिक सोच के साथ साथ उनकी एक प्रवृति थी जो निरंतर काम करने से रोकती रहती थी अब उसका कारण क्या था कभी भी मेरी समझ में नहीं आया।
    विनम्र श्रद्धांजलि।

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