जानें क्यों मान्यता है कि मां शीतला के दर्शन पूंजन के बाद ही मां विन्ध्यवासिनी के दर्शन का भक्तो को मिलता है फल

जौनपुर। चौकियां धाम मां शीतला का दर्शन करने के बाद ही विंध्यवासिनी देवी का दर्शन करने हेतु पूर्वाचल के श्रद्धालु जाते हैं। मान्यता है कि यहां के बाद ही वहां जाने पर लोगों की मिन्नतें पूर्ण होती है। यही कारण है कि पूर्वांचल के जिलो गोरखपुर, देवरिया, बलिया, आजमगढ़, मऊ, गाजीपुर, फैजाबाद, आंबेडकरनगर सहित तमाम जनपदों के श्रद्धालुओं का तांता यहां मां के दरबार लगा रहता है।
किवदंतियां हैं कि देवचंद माली के नाम पर शीतला चौकियां के गांव का नाम देवचंदपुर पड़ा। इनके परिवार में शीतल नाम की भक्त महिला थी। उसके पति की अल्पायु में ही मौत हो गई। इसके बाद वह सती हो गई। उसी सती स्थल पर ईंट की चौकी तथा पत्थर रखकर देवचंद पूजा-अर्चना करने लगे। यह घटना 1772 के आस-पास की बताई जाती है। धीरे-धीरे यह स्थान एक शक्तिपीठ के रूप में तब्दील हो गया।
पौराणिकता जिला मुख्यालय से छह किलोमीटर की दूरी पर पूर्वोत्तर की दिशा में मां शीतला चौकियां धाम है। मार्कण्डेय पुराण में उल्लिखित ‘शीतले तू जगन्नमाता, शीतले तू जगत्पिता, शीतले तू जगत्धात्री, शीतलाय नमो नम:’ से शीतला देवी की पौराणिकता का पता चलता है। यहां आने वाला हर श्रद्धालु मनोवांछित कामना करके आता है। शारदीय और चैत्र नवरात्र में इतनी ज्यादा भीड़ हो जाती है कि स्थल कम पड़ जाता है।
शीतला धाम के प्रबंधक अजय कुमार पंडा की माने तो यहां पर वैसे तो बारहोंमास बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन-पूजन के लिए आते हैं, लेकिन नवरात्र में मेला का रेला उमड़ जाता है। धाम परिसर में सुरक्षा व्यवस्था के मद्देनजर सीसी टीवी कैमरे लगाए गए हैं। बाहरी गेट पर दो मेटल डिटेक्टर लगा है। इसी से होकर श्रद्धालुओं को दर्शन को प्रवेश करना होता है। भक्तों को कोई दिक्कत न हो इसकी व्यवस्था की गई है।
मंदिर के पुजारी शिव कुमार पंडा ने बताया- नवरात्र में भक्तों के लिए बेहतर प्रबंध किया गया है। भोर में 4.30 बजे आरती के बाद मंदिर का कपाट खोल दिया जाता है। इसके बाद दर्शन-पूजन होता है। यहां शादी-विवाह, मुंडन, जनेऊ आदि संस्कार मंदिर परिसर में संपन्न कराने की भी व्यवस्था है।

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