भारतीय संविधान विश्व का इकलौता संविधान जिसमें है शान्ति का उपबन्ध ---डॉ अखिलेश्वर शुक्ला



                                          
दुनिया के देश अपनी विदेश नीति अपने राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखते हुए निर्धारित करते हैं। राष्ट्रीय हित सबके अलग-अलग होते हैं। यह उस देश की भौगोलिक, ऐतिहासिक, सामाजिक , आर्थिक, सांस्कृतिक, प्राकृतिक, सैनिक बल , परंपराओं आदि पृष्ठभूमि पर निर्भर करता है। भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन काल (1885 -1946)में भारतीय नेताओं ने बैदेशिक संबंधों पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करना प्रारंभ कर दिया था। 
इसी दौरान सह अस्तित्व, विश्व शांति ,पड़ोसी से साहचर्य मैत्री के विचार आने लगे थे। कारण था - प्रथम तथा द्वितीय विश्वयुद्ध में ब्रिटिश साम्राज्य ने बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया था। जिसमें भारतीय जनधन की अपार हानि हुई थी। राष्ट्रीय आंदोलन काल से ही दमनकारी एवं साम्राज्यवादी नीतियों का विरोध -भारत का बुनियादी सिद्धांत बन गया । अफगानिस्तान, ईरान ,तिब्बत, वर्मा के विरुद्ध ब्रिटिश कार्यवाही से भारत असंतुष्ट था। यही कारण है कि भारतीय संविधान विश्व का इकलौता संविधान है, जिसके चौथे अध्याय में अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति का उपबंध किया गया है।                         भारत के 07 पड़ोसी देश हैं। जिसमें बांग्लादेश 4096 किलोमीटर ,चीन 3488 किलोमीटर, पाकिस्तान 3330 किलोमीटर ,नेपाल 1751किलोमीटर ,बर्मा( म्यांमार )1643 किलोमीटर, भूटान 699 किलोमीटर , अफगानिस्तान 106 किलोमीटर, की सीमाएं भारत से मिलती है ।इसमें  बांग्लादेश की सीमा के बाद सबसे बड़ी सीमा चीन की है । अफगानिस्तान की सीमा सबसे छोटी है। नेपाल के उत्तर में चीन का स्वशासी राज्य तिब्बत तथा तीन तरफ से- पूर्व पश्चिम व दक्षिण में भारत है। नेपाल की संस्कृति व परंपराएं स्वाभाविक रूप में भारत से मेल खाती हैं । फिर उसका अचानक रंग बदलना और भारत के तीन क्षेञ लिंपियाधुरा , लिपुलेख , काला पानी , को अपना बताकर नये विवाद को जन्म देना- आश्चर्यचकित करने वाली घटना है । वैसे चीन की चाल से नेपाल यदि सावधान नहीं होगा , तो तिब्बत एवं पाकिस्तान की स्थिति से सबक लेगा । परम्परागत (स्वाभाविक) सहयोगी भारत के  कुटनीतिक मार्ग ही उसे इस संकट से निजात दिला सकते  है। तिब्बत को लेकर चीन में 1959 के विद्रोह के बाद दलाई लामा को भारत में शरण दी गई थी। तब से लगातार भारत के विरुद्ध चीन की निगाहें तनी रहती हैं।                                        मई 2020 के प्रथम सप्ताह से चीन ने भारतीय सीमा पर जो युद्ध की स्थिति पैदा किया है । यह पहली घटना नहीं है। इसके पूर्व तीन बार वह सीमा पर युद्ध की स्थिति पैदा कर चुका है। 1962 में जब हिंदी चीनी भाई -भाई का नारा लग रहा था। आजाद भारत अभी अपने पैरों पर खड़ा होने की तैयारी कर रहा था। अचानक चीन ने हमला करके अक्साई चीन पर कब्जा कर लिया। कुछ ही दिनों बाद पुन: 1967 में चीन भारतीय सीमा में प्रवेश करना चाहा, लेकिन सतर्क भारतीय सेना ने 300 चीनी सैनिकों को मार गिराया था। भारत के 65 सैनिक शहीद हुए थे । फिर डोकलाम में 16 सितंबर 2017 को भूटान चीन सीमा पर सड़क निर्माण को लेकर ढाई महीने तक विवाद की स्थिति रही अंततः चीनी सेना वापस चली गई। यह चौथा मौका है ।  पूरी दुनिया कोरोना संक्रमण से कराह रही है। चीन अपनी सीमा विस्तार को अंजाम देने में लगा है। एक तरफ माउंट एवरेस्ट को नापने के नाम पर 5G टावर लगा रहा है । दूसरी तरफ हवाई पट्टी से लेकर बंकर, सड़क ,अस्थाई निर्माण की गतिविधि चला रहा है। इतना ही नहीं पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में जाकर पाक सेना की तैयारी ,तैनाती का जायजा ले रहा है।  पाकिस्तानी ऊंचाधिकारी व आतंकवादियों के साथ बैठकें करके भारत के विरुद्ध सीमा पर तनाव पैदा कर रहा है। पाकिस्तान के सहारे हिंद महासागर में भी दबदबा बनाने का प्रयास कर रहा है। भारतीय फौज की तैयारी , तैनाती एवं रुख को देखकर उसके होश उड़ गए हैं । लेकिन गीदड़ भभकी से बाज नहीं आ रहा है । उसके बयानों पर तो कतई भरोसा नहीं किया जा सकता है।                                                                विदेश नीति के निर्धारण में अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों की भी भूमिका महत्वपूर्ण होती है। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद विश्व पटल पर दो महा शक्तियां (अमेरिका और सोवियत संघ) अंतरराष्ट्रीय राजनीति में अपनी भूमिका अदा कर रही हैं। जब भारत स्वतंत्र हुआ तो दोनों महा शक्तियों के बीच शीत युद्ध छिड़ा हुआ था। भारतीय नेतृत्व ने तटस्थता की नीति अपनाई ,और गुटनिरपेक्ष आंदोलन (1961) जैसी संस्था का निर्माण किया गया। जिसके सदस्यों की संख्या 120 हो गई। स्वतंत्र भारत की आर्थिक हालत खस्ता हो चुकी थी। जिसे पटरी पर लाना था । लेकिन पाकिस्तान लगातार भारत के विरुद्ध सीमा क्षेत्र एवं कश्मीर को लेकर विवाद खड़ा करता रहा । 1965 व 1971 में पाकिस्तान ने युद्ध के हालात पैदा कर दिए । सोवियत संघ का झुकाव प्रारंभ से ही भारत की तरफ रहा । जबकि अमेरिका एवं कुछ यूरोप के देश पाकिस्तान के साथ थे। रुष ने संयुक्त राष्ट्र संघ में बार बार वीटो पावर का प्रयोग भारत के पक्ष में किया। वहीं अमेरिका समर्थित देश पाकिस्तान का साथ दे रहे थे। वर्तमान परिदृश्य कुछ बदला हुआ है। अमेरिका यूरोप के देशों का झुकाव भारत की तरफ तथा भारत का अमेरिका के तरफ हुआ । ऐसे समय में पाकिस्तान व चीन - रूस का सहयोग प्राप्त करने लगे। इससे भ्रम की स्थिति पैदा होना स्वाभाविक था। लेकिन रूस चाहे कहीं रहे, उसकी आत्मा भारत के साथ है। भारत हिन्द महासागर में मजबूत है तो रुस प्रशान्त महासागर में मजबूत है। भारत में नौजवानों, कामगारों की बहुलता है। वहीं रुस में कामगारों का अभाव। भारत-रुस का रक्षा ,ऊर्जा, एटमी, अंतरिक्ष संबंधी पारस्परिक संबंध स्थाई और अहम है। शीत युद्ध काल में भी रणनीतिक ,सैनिक, आर्थिक, राजनयिक, संबंध मजबूत रहे हैं। आजादी के बाद से ही रूस का आत्मीय व्यवहार सदाबहार रहा है।                                                                      भारत की विदेश नीति -तटस्थता ,शांति- वार्ता , कूटनीतिक प्रयास ,शक्ति संतुलन, क्षेत्रीय अखंडता, अहस्तक्षेप की नीति, सीमा सुरक्षा , आक्रामकता की जगह निर्माणकता, किसी देश पर प्रतिबंध का समर्थन नहीं करना, अंतरराष्ट्रीय संगठनों को समर्थन एवं मजबूती प्रदान करना, संकट काल में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सहयोग का भाव रखते हुए , विश्व शांति, वसुधैव कुटुंबकम् के रास्ते सामाजिक आर्थिक विकास के लक्ष्य को प्राप्त करने का है। किसी समस्या के समाधान के लिए "युद्ध " अंतिम विकल्प होता है। जिसके लिए भारत ने अपने को तैयार कर लिया है। जब कोई देश भारत की या भारतीय नेतृत्व की प्रशंसा करता है, तो हमें उसके निहितार्थ की समक्ष है । भारत भ्रम की स्थिति में नहीं है।                                                         अंत में कहना चाहूंगा कि- "कौटिल्य का मंडल सिद्धांत" तथा गोस्वामी तुलसीदास कृत श्रीरामचरितमानस की यह पंक्ति-
"तुलसी कबहुं न त्यागिये, अपने कुल की रीति।  लायक हो सो कीजिए, बैर ब्याह अरु प्रीति ।।        जैसे सुञ वाक्य भारत के लक्ष्य प्राप्ति में सहायक सिद्ध होंगे।       

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  1. प्रकाशित करने के लिए आभार, धन्यवाद, शुभ कामनाएं।

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